प्रारंभिक जीवन और जन्म
रमण महर्षि (1879-1950) का जन्म 30 दिसंबर 1879 को तमिलनाडु के तिरुचुझी गांव में हुआ था। उनका मूल नाम वेंकटरमन अय्यर था। उनके पिता का नाम सुंदरम अय्यर और माता का नाम अलगम्मल था। वे एक मध्यमवर्गीय ब्राह्मण परिवार से संबंध रखते थे।
बचपन और शिक्षा
रमण महर्षि के बचपन का नाम वेंकटरमन था। वे एक सामान्य बच्चे की तरह पले-बढ़े और स्कूल की शिक्षा प्राप्त की। उनकी प्रारंभिक शिक्षा तिरुचुझी और बाद में मदुरै में हुई। बचपन में वे खेल-कूद में रुचि रखते थे और पढ़ाई में विशेष रुचि नहीं दिखाते थे।
आध्यात्मिक जागृति का क्षण
सबसे महत्वपूर्ण घटना 1896 में घटी जब वे केवल 16 वर्ष के थे। एक दिन अचानक उन्हें मृत्यु का गहरा भय सताने लगा। इस डर ने उन्हें आत्म-अन्वेषण के लिए प्रेरित किया। उन्होंने स्वयं से प्रश्न किया – “मैं कौन हूं? मृत्यु के बाद क्या होता है?”
अरुणाचल की यात्रा
इस आध्यात्मिक अनुभव के बाद, 29 अगस्त 1896 को बिना किसी को बताए वे घर छोड़कर तिरुवन्नामलै के लिए निकल गए। यहां अरुणाचलेश्वर मंदिर स्थित है, जिसे वे अत्यंत पवित्र मानते थे। उन्होंने अरुणाचल पर्वत को अपना गुरु माना और वहीं बस गए।
तपस्या और साधना के वर्ष
तिरुवन्नामलै पहुंचने के बाद रमण महर्षि ने कई वर्षों तक कठोर तपस्या की। वे:
- अरुणाचलेश्वर मंदिर के अंदरूनी कक्षों में रहे
- कई दिनों तक मौन रहते थे
- भोजन की चिंता नहीं करते थे
- गहरी समाधि में लीन रहते थे
श्री रमणाश्रम की स्थापना
समय के साथ लोग उनकी आध्यात्मिक ज्ञान को पहचानने लगे। भक्त और जिज्ञासु उनके पास आने लगे। 1922 में उनकी माता अलगम्मल का देहांत हुआ। उनकी समाधि के स्थान पर श्री रमणाश्रम की स्थापना हुई, जो आज भी एक प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र है।
शिक्षाएं और दर्शन
आत्म-विचार (Self-Inquiry)
रमण महर्षि की मुख्य शिक्षा “मैं कौन हूं?” का विचार था। उनके अनुसार यह प्रश्न व्यक्ति को आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाता है। वे कहते थे कि सभी विचारों का मूल “मैं” विचार है।
मौन की शक्ति
महर्षि अक्सर मौन रहते थे और मानते थे कि मौन सबसे प्रभावशाली उपदेश है। उनका कहना था कि शब्दों से कहीं अधिक शक्तिशाली मौन की भाषा है।
सहज समाधि
उन्होंने सहज समाधि की अवस्था का वर्णन किया, जिसमें व्यक्ति सामान्य जीवन जीते हुए भी आत्म-साक्षात्कार की अवस्था में रहता है।
प्रमुख शिष्य और अनुयायी
रमण महर्षि के कई प्रसिद्ध शिष्य हुए:
- पॉल ब्रंटन – ब्रिटिश लेखक जिन्होंने पश्चिम में महर्षि को प्रसिद्ध बनाया
- आर्थर ऑसबॉर्न – जिन्होंने महर्षि की शिक्षाओं को लिखा
- मुरुगनार – तमिल कवि और भक्त
- अन्नामलै स्वामी – प्रमुख शिष्य
साहित्य और रचनाएं
महर्षि ने स्वयं बहुत कम लिखा, लेकिन उनकी प्रमुख कृतियां हैं:

उल्लडु नारपदु (40 छंद)
यह उनकी सबसे महत्वपूर्ण दार्शनिक कृति है जो आत्म-विचार पर आधारित है।
उपदेश सारम्
यह योग, भक्ति और ज्ञान के सार को प्रस्तुत करती है।
नान यार (मैं कौन हूं?)
यह आत्म-विचार की विधि को समझाती है।
व्यक्तित्व और चरित्र
रमण महर्षि के व्यक्तित्व की विशेषताएं:
- सहज सरल स्वभाव – वे अत्यंत सरल और निष्कपट थे
- करुणा – सभी जीवों के प्रति दया भाव
- निष्पक्षता – जाति, धर्म, राष्ट्रीयता का भेद नहीं करते थे
- हास्य प्रियता – हंसमुख प्रकृति और हास्य की समझ
अंतिम दिन और महाप्रयाण
1949 में उन्हें सार्कोमा नामक कैंसर हुआ। डॉक्टरों ने इलाज का सुझाव दिया लेकिन महर्षि ने कहा कि शरीर नश्वर है। 14 अप्रैल 1950 को 70 वर्ष की आयु में उन्होंने देह त्याग दिया। मृत्यु के समय आकाश में एक चमकदार तारा दिखाई दिया था।
विश्व पर प्रभाव
रमण महर्षि का प्रभाव केवल भारत में ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण विश्व में फैला हुआ है। उनकी शिक्षाएं आज भी लाखों लोगों के लिए मार्गदर्शक बनी हुई हैं। पश्चिमी देशों में भी उनके अनुयायी मौजूद हैं।
आज का रमणाश्रम
आज भी तिरुवन्नामलै स्थित श्री रमणाश्रम में हजारों श्रद्धालु आते हैं। यहां नियमित रूप से वेद पाठ, भजन और आत्म-विचार की शिक्षा दी जाती है।
निष्कर्ष
रमण महर्षि 20वीं सदी के महानतम संतों में से एक थे। उनकी आत्म-विचार की शिक्षा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। उन्होंने दिखाया कि आध्यात्मिक जागृति के लिए कोई जटिल साधना की आवश्यकता नहीं, केवल “मैं कौन हूं?” का सच्चा विचार ही पर्याप्त है।
उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि सच्चे गुरु वे होते हैं जो अपने आचरण से शिक्षा देते हैं। रमण महर्षि की जीवनी हमें सिखाती है कि आत्म-साक्षात्कार ही जीवन का परम लक्ष्य है।
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