भारत की संत परंपरा में संत लल्लेश्वरी का इतिहास, जिन्हें लल्देद (Lalded) या लल्ला योगेश्वरी भी कहा जाता है, का एक विशेष स्थान है। 14वीं शताब्दी की इस महान संत कवयित्री ने कश्मीर की आध्यात्मिक धारा को एक नई दिशा दी। उन्होंने न केवल भक्ति का मार्ग दिखाया, बल्कि कश्मीरी भाषा में अद्वितीय दोहों (वाख) के माध्यम से आत्मज्ञान का संदेश दिया।
संत लल्लेश्वरी का जीवन परिचय
जन्म: 1320 ईस्वी के आस-पास
स्थान: पंपोर, कश्मीर
धार्मिक पृष्ठभूमि: हिंदू (कश्मीरी शैव परंपरा)

लल्लेश्वरी का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनका वास्तविक नाम पद्मावती या लल्ला बताया जाता है। उनका विवाह किशोरावस्था में ही एक ब्राह्मण युवक से हुआ, लेकिन विवाह के बाद का जीवन अत्यंत कष्टदायक रहा। ससुराल में उन्हें शोषण, उपेक्षा और अपमान का सामना करना पड़ा।
इन परिस्थितियों ने उन्हें सांसारिक जीवन से विरक्त कर दिया और उन्होंने आत्मज्ञान की खोज में जीवन समर्पित कर दिया।
आध्यात्मिक गुरुकुल की ओर
लल्लेश्वरी ने महान योगी सिद्ध श्रीकंठ को अपना गुरु बनाया और उनसे कश्मीर शैवदर्शन, तंत्र साधना और शिव योग की गूढ़ विद्या सीखी। उन्होंने पारंपरिक धार्मिक कर्मकांडों को त्याग कर आत्मा की अनुभूति पर बल दिया।
लल्ला संन्यासिनी बन गईं और सामाजिक परंपराओं को तोड़ते हुए नग्न अवस्था में कश्मीर की गलियों में घूमकर भक्ति और आत्मबोध का प्रचार करने लगीं। उनका यह रूप समाज के लिए आश्चर्यजनक था, लेकिन उनका ज्ञान और सरल जीवनशैली लोगों के हृदय को छू गई।
संत लल्लेश्वरी की शिक्षाएं
संत लल्लेश्वरी ने अपने अनुभवों को “वाख” (कश्मीरी दोहों) के रूप में व्यक्त किया। उनके वाख गहरे आध्यात्मिक अर्थों से भरे हैं, जो आत्मा, परमात्मा, अहंकार, भक्ति और मोक्ष जैसे विषयों को सरल भाषा में समझाते हैं।
प्रमुख शिक्षाएं:
ईश्वर सर्वव्यापी है: वह मंदिर-मस्जिद में नहीं, हर प्राणी में है।
आंतरिक अनुभव ही सच्चा ज्ञान है: बाहरी पूजा-पाठ की बजाय ध्यान, तप और आत्मदर्शन जरूरी है।
धर्म कोई वस्त्र नहीं, चेतना है: उन्होंने धर्म की संकीर्णता को नकारा और मानवता को सर्वोपरि माना।
अहंकार त्यागो: आत्मा का अनुभव केवल विनम्र और खाली हृदय में ही संभव है।
संत लल्लेश्वरी के वाख: ज्ञान की अमूल्य धरोहर
लल्ला के वाख आज भी कश्मीरी साहित्य और अध्यात्म का अनमोल हिस्सा हैं। ये वाख छोटे-छोटे दोहों के रूप में होते हैं, जिनमें गहराई और सादगी दोनों होती हैं।
एक प्रसिद्ध वाख:
“शिव छुइ थालि थालि रोजान, मो जान हिन्द त मुसलमान।”
(शिव हर जगह हैं – क्यों पूछते हो कौन हिन्दू है, कौन मुसलमान?)
इस वाख के माध्यम से उन्होंने सांप्रदायिकता और धार्मिक भेदभाव को नकारते हुए सर्वधर्म समभाव की बात कही।
संत लल्लेश्वरी का प्रभाव
लल्लेश्वरी केवल हिन्दू संत नहीं थीं – उन्होंने इस्लाम के सूफी संतों को भी प्रभावित किया। प्रसिद्ध कश्मीरी सूफी संत शेख नूरुद्दीन वली उन्हें अपनी “रूहानी माँ” मानते थे। लल्ला के जीवन और वाख ने कश्मीर में आध्यात्मिक एकता की नींव रखी।
उन्होंने स्त्री-शक्ति का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत किया – एक महिला जो सामाजिक बंधनों को तोड़कर योगिनी, रहस्यवादी और शिक्षक बनी।
संत लल्लेश्वरी की विरासत
आज भी कश्मीर में संत लल्लेश्वरी का सम्मान एक “लोकमाता” के रूप में किया जाता है। उनके नाम पर स्कूल, संस्थान, और सड़कें बनी हैं। उनकी शिक्षाएं धर्मनिरपेक्षता, आत्मा की खोज, और मानवता के मूल्यों को प्रोत्साहित करती हैं।
उनके वाख आज भी पाठ्यक्रमों, शोध, कवि सम्मेलनों और भक्ति साहित्य में शामिल किए जाते हैं।
निष्कर्ष
संत लल्लेश्वरी नारी शक्ति, आत्मज्ञान और सार्वभौमिक प्रेम की प्रतीक थीं। उन्होंने अपने जीवन से यह सिद्ध कर दिया कि सच्ची भक्ति और ज्ञान किसी जाति, लिंग या परंपरा की मोहताज नहीं होती। उनकी शिक्षाएं आज के दौर में और भी प्रासंगिक हैं, जब धर्म के नाम पर विभाजन और संघर्ष हो रहा है।
हमें संत लल्लेश्वरी से प्रेरणा लेकर मानवता, करुणा और आत्मसाक्षात्कार के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए।
