Home धर्म आध्यात्मिक भारत और मांस उद्योग: करुणा बनाम व्यापार का सच

आध्यात्मिक भारत और मांस उद्योग: करुणा बनाम व्यापार का सच

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हम सब जानते है कि भारत को सदियों से एक अध्यात्मिक राष्ट्र माना गया है।

यहाँ अहिंसा, करुणा और जीवदया को धर्म का मूल बताया गया।

हमने पशुओं को देवी-देवताओं का वाहन माना, उन्हें ‘गौ माता’ कहा, मंदिरों में उनके लिए पूजा की।

लेकिन आज, यही भारत —

दुनिया के सबसे बड़े मांस निर्यातकों में शामिल हो गया है।

यह सिर्फ एक विरोधाभास नहीं,  बल्कि हमारे  आध्यात्मिक होने पर सवाल खड़ा करता है।

भारत में मांस उत्पादन – कुछ चौंकाने वाले तथ्य

भारत हर साल 9 मिलियन टन (90 लाख टन) मांस का उत्पादन करता है।

भारत दुनिया का सबसे बड़ा भैंस  के मांस निर्यातक है।

2023 में मांस निर्यात से भारत को ₹30,000 करोड़ से अधिक की कमाई हुई।

हर साल मारे जाने वाले जानवर:

500+ करोड़ मुर्गियाँ

30 करोड़ से ज्यादा बकरी, भेड़, सूअर

100 लाख से अधिक भैंसें

क्या हमने कभी सोचा कि हैं हिंसा जानवरों पर क्यों और कैसे हो रही  है?

धर्म, परंपरा और हमारी ज़िम्मेदारी

अहिंसा परमो धर्मः – यह सिर्फ एक श्लोक नहीं, भारतीय जीवनशैली का मूल था।

बुद्ध, महावीर, कबीर, तुलसीदास, गांधी – सबने करुणा की राह पर चलने की प्रेरणा दी।

लेकिन आज हम धर्म के नाम पर सिर्फ गाय की रक्षा करते है,

जबकि बकरी, मुर्गी, भैंस, मछली — सब को बेरहमी से मारा जाता है।

क्या करुणा का धर्म केवल एक प्रजाति के लिए सीमित है? क्या बाकी जानवरों की पीड़ा हमारे लिए कोई मायने नहीं रखती।

आर्थिक तर्क बनाम नैतिक सवाल

सरकारें कहती हैं – मांस उद्योग से रोजगार मिलता है, विदेशी मुद्रा आती है।

लेकिन क्या हम यह भूल गए कि

“न्याय वह नहीं जो लाभ दे, बल्कि वह जो करुणा से प्रेरित हो।”

जैसे-जैसे मांस का उत्पादन बढ़ रहा है,

वैसे-वैसे पशुओं की क्रूरता, पर्यावरणीय प्रदूषण और मानव स्वास्थ्य पर खतरे भी बढ़ रहे हैं।आज पशु पालन के लिए जंगलों को काटा जा रहा है 

माधान: शाकाहार – करुणा का पहला कदम

शाकाहार केवल भोजन नहीं, यह एक आध्यात्मिक क्रांति है।

इससे न केवल करोड़ों पशुओं की जान बच सकती है,

बल्कि पर्यावरण संरक्षण, स्वास्थ्य सुधार और मानसिक शांति भी संभव है।

निष्कर्ष

“भारत फिर से आध्यात्मिक तभी बन सकता है, जब उसकी थाली से खून हटे और करुणा जुड़े।”

“जब धर्म सिर्फ पूजा में नहीं, भोजन में भी दिखे।”

आइए, एक ऐसा भारत बनाएं –

जहाँ पशु भय से नहीं, प्रेम से इंसान के पास आएं।

जहाँ आध्यात्म केवल बोलने की चीज़ न हो – जीने का तरीका बने।

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